भानुप्रतापपुर। क्षेत्र में शनिवार रात करीब 11:30 बजे एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जिसने एक बार फिर से समाज में पशुओं के प्रति संवेदनहीनता और सरकारी लापरवाही को उजागर कर दिया। सड़क किनारे एक काला घोड़ा गंभीर रूप से बीमार हालत में खड़ा था, जो किसी भी वक्त हादसे का शिकार हो सकता था।
स्थानीय सिटी ढाबे के संचालक को जैसे ही यह जानकारी मिली, उन्होंने बिना समय गंवाए मानवता का परिचय दिया। संचालक ने भानुप्रतापपुर के निवासी संदीप छाबड़ा और सौरव सचदेव की मदद से घोड़े को सड़क से हटाकर ढाबे में सुरक्षित स्थान पर बांध दिया। तीनों ने मिलकर घोड़े के लिए खाना-पानी की व्यवस्था की, जिससे उसकी हालत में कुछ सुधार आया।
सड़क पर तड़पता घोड़ा और मालिकों की बेरुखी
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यह घोड़ा संभवतः अपने जीवन की अंतिम सांसें गिन रहा था। उसकी आंखों में दर्द और बेबसी साफ झलक रही थी। सूत्रों का कहना है कि यह घोड़ा कुछ घोड़ेवालों का था, जो उसी दिन भानुप्रतापपुर आए थे। जब घोड़ा बीमार हो गया, तो उन्होंने उसे सड़क पर तड़पता छोड़ दिया और स्वयं वहां से चले गए। यह कृत्य न केवल अमानवीय था, बल्कि पशु शोषण की पराकाष्ठा को भी दर्शाता है
पशु चिकित्सालय की लापरवाही उजागर: रात में सभी डॉक्टर गायब
घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय लोगों ने भानुप्रतापपुर पशु चिकित्सालय के सभी डॉक्टरों को फोन किया, लेकिन किसी ने भी फोन नहीं उठाया। अस्पताल पहुंचने पर वहां ताला लगा मिला।
यह चौंकाने वाली बात है कि पशु चिकित्सालय में चार डॉक्टर पदस्थ होने के बावजूद रात के समय कोई भी उपलब्ध नहीं था। इस स्थिति में बीमार मवेशियों के लिए रात में इलाज पाना लगभग असंभव हो जाता है।
जब कांकेर जिले के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. सत्यम मित्रा को घटना की जानकारी दी गई, तो उन्होंने तत्काल सभी डॉक्टरों से संपर्क करने की कोशिश की, परंतु भानुप्रतापपुर के किसी भी डॉक्टर ने उनका कॉल तक रिसीव नहीं किया। यह प्रशासनिक उदासीनता और पेशेवर जिम्मेदारी के प्रति घोर लापरवाही का प्रमाण है।
मानवता की मिसाल बने केपी मिश्रा
जब सभी डॉक्टर अपने घरों में सोए रहे, तब पशु चिकित्सालय के वरिष्ठ कर्मचारी केपी मिश्रा , जो डॉक्टर नहीं हैं लेकिन 30 वर्षों से ईमानदारी से सेवा दे रहे हैं, आधी रात को स्वयं मौके पर पहुंचे। उन्होंने अपनी समझ और अनुभव के बल पर घोड़े का इलाज किया और उसकी जान बचाई। उनका यह कदम न केवल एक जीवन बचाने वाला साबित हुआ, बल्कि यह भी दिखाया कि सच्ची मानवता किसी पद या डिग्री की मोहताज नहीं होती।