छत्तीसगढ़

गौरैया धाम में खुदाई करने से निकलती है पाषाण मूर्तियां, अब तक 143 मूर्तियों का संरक्षण,

रायपुर। बालोद जिले के गुंडरदेही विकासखंड के ग्राम चौरेल में स्थित गौरैया धाम कई समाजों का संगम है। तांदुला नदी के किनारे प्राकृतिक सौंदर्य के बीच एक टीला नुमा जगह पर स्थित गौरैया धाम में कई ऐसी मूर्तियां है जो यहां किसी समय राजा महाराजाओं के निवास होने व धार्मिक आस्था का केंद्र होने का प्रमाण देता है। पुरातात्विक महत्व की इन मूर्तियों के कारण इसे पर्यटन क्षेत्र घोषित किया गया है। यहां का धार्मिक महत्व भी काफी बड़ा है, प्रत्येक वर्ष माघ पूर्णिमा में देवी-देवताओं का दर्शन करने लाखों की संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। गौरैया धाम के इतिहास के बारे में कोई स्पष्ट साक्षी वह प्रमाण नहीं है कुछ किवदंतियों के आधार पर ही लोग इसके बारे में बताते हैं लेकिन यहां की खुदाई से निकलने वाली वस्तुएं इसके विशेष जगह होने की ओर इशारा करती है।

जिला मुख्यालय बालोद से दुर्ग मार्ग पर 18 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पैरी से बाई दिशा में लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर तांदुला नदी के सुरम्य तट पर स्थित है गौरैया धाम। यह क्षेत्र ग्राम चौरेल के अंतर्गत आता है। इसके उद्गम के बारे में कई कथाएं प्रचलित है। इनमें सबसे प्रमुख यह है जिसमें कहा गया है कि एक बार सभी देवी देवता तीर्थ भ्रमण करते हुए शिवरात्रि में यहां पहुंचे और यहीं पर समाधि में लीन हो गए। भगवान शिव ने समाधि खुलने के बाद देखा कि माता गौरी व गौरैया पक्षी अपने हाथों में चावल लिए प्रभु की भक्ति में लीन हैं। भगवान शिव ने दोनों की सेवा भाव से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया। शिव ने गौरैया को आशीर्वाद दिया कि तुम मेरा संदेश घर-घर पहुंचना।

माना जाता है कि इसलिए गौरैया पक्षी चिंव चिंव (शिव शिव) कर भगवान शिव का स्मरण घर घर करते हैं। गौरैया वह पक्षी है जो बहुत छोटी होती है और हर घरों में पाई जाती है। जिसे हम गांव में गोड़ेला चिरई करते हैं। हमेशा उनके मुंह से चिंव चिंव की आवाज निकलती रहती है। (इस संबंध में यहां के निवासी स्वर्गीय द्वारिका प्रसाद चंद्राकर की हस्तलिखित एक कागज ही समिति के पास है।) इसके अलावा एक किवदंतियां यह भी है कि एक बार यहां गौरैया जाति के एक बाबा आए थे जो सांप पकड़ने का काम करते थे। वह यही निवास करने लगे और हमेशा भगवान शंकर की भक्ति में डूबे रहते थे। उनकी मौत के बाद यहां मूर्ति बना दी गई जो आज भी पीपल पेड़ के नीचे स्थापित है। उसके नाम के अनुरूप इस जगह को गौरैया धाम कहकर लोग पूजा अर्चना करने लगे।