रावण में अनेक गुण पर अहंकार ने कराया राम के हाथों पतनः शुभांगी पाचघेरे
रायपुर। रावण भगवान शिव का परम भक्त था। रावण, उद्भट राजनीतिज्ञ, महाप्रतापी, महापराक्रमी योद्धा था। वो शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता, प्रकाण्ड विद्वान, पंडित एवं महाज्ञानी भी था, लेकिन अहंकार उसका एक ऐसा दुर्गुण था, जिसने उसका अंत कराया। उसी अहंकार के कारण श्रीराम ने उसका वध किया। उक्ताशय के विचार महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान मंडल सदस्य शुभांगी पाचघेरे ने व्यक्त किए।
शुभांगी ने बताया कि ब्रह्मा के मानस पुत्र ऋषि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा के पुत्र का नाम रावण था। ऋषि विश्रवा की दो पत्नियां थीं. पहली पत्नी इलबिड़ा के गर्भ से कुबेर पैदा हुए जबकि दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा का जन्म हुआ। ऋषि विश्रवा की दूसरी पत्नी कैकसी राक्षस कुल से थीं। इसलिए रावण जहां एक ओर ज्ञानी था, वहीं दूसरी ओर राक्षस कुल के कारण उसमें अहंकार था।
शुभांगी ने बताया कि रावण शब्द संस्कृत के 'रु' (ध्वनौ) धातु से बना है, जिससे 'रव' शब्द बनता है. 'रव' का अर्थ है 'शोर', 'दहाड़', 'गरज'। रावण का अर्थ जोर-जोर से और चिल्लाकर बोलने वाला होता है। रावण को संगीत में विशेष रूचि थी और उत्तम वीणा वादन करता था। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था। कई गुणों से संपन्न होने के बाद भी अहंकारी स्वभाव उसके पतन का कारण बना। रावण का पात्र हमें इस बात की सीख देता है कि आप कितने भी ज्ञानी हो जाओ लेकिन उसका अहंकार बिल्कुल मत करना।