अतिथि से न पूछें आने की तिथि: रामनाथ रामचंद्र
- महाराष्ट्र मंडल में जारी रामकथा के चौथे दिन कथावाचक ने जेन जी के रिश्तेदारों से कटने पर किया कटाक्ष
रायपुर। जब भी अतिथि हमसे कहते हैं कि हम आपसे मिलने घर आ रहे हैं, तो यह हमारा उतावलापन ही होता है कि हम उनसे आने की तिथि और समय पूछते हैं। जबकि अतिथि का अर्थ होता है बिना तिथि बताए आने वाला। ऋषि मतंग ने शबरी से कहा कि तुम यहीं प्रतीक्षा करो, भगवान राम तुमसे मिलने आएंगे। शबरी ने नहीं पूछा कि कब आएंगे। यह होता है अतिथि के आगमन को लेकर धैर्य। पुणे के आचार्य रामनाथ रामचंद्र अय्यर ने महाराष्ट्र मंडल में जारी रामकथा के चौथे दिन उक्ताशय के विचार व्यक्त किए।

कथावाचक ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी जिन्हें हम जेन जी कहते हैं, उन्हें रिश्तेदार पसंद नहीं। वे बुर्के में रहते हैं, यानी रिश्तेदारों के आने पर अंदर अपने कमरे में कैद हो जाते हैं। मां उन्हें रिश्तेदारों से मिलाने के लिए लगातार कोशिश करती है, लेकिन वे बाहर नहीं आते। यही जेन जी डब्लूडब्लूडब्लू डाट काम में जीवनसाथी तलाशती है। लड़के के माता-पिता को डस्टबीन समझने और कहने वाली लड़कियों से कोई उनके माता-पिता के बारे में पूछे। ऐसी लड़कियां आमतौर अविवाहित और बढ़ती उम्र के साथ अवसाद में चली जाती हैं।
आचार्य अय्यर ने पूजा की विधि के संदर्भ में कहा कि भगवान की आरती घी के दीये से की जाती है। जबकि अपने परिजन अथवा रिश्तेदार की तेल की दीये से। जन्मदिन हो या रक्षाबंधन, वैवाहिक रस्में हो या किसी के स्वागत का क्षण, हमें तेल के दीये का ही उपयोग करना चाहिए। इसी तरह मंगल कार्य में शहनाई से मंगलवाद्य और कोई दूसरा नहीं होता। शहनाई की धुन मिल जाए, तो सर्वश्रेष्ठ।
कथावाचक रामनाथ रामचंद्र ने कहा कि प्रवचन सुनते समय हमारा ध्यान देह पर नही देहि पर होना चाहिए। देहि अर्थात् भगवान। भक्ति में भक्त का अस्तित्व नहीं रहना चाहिए। भक्ति राममय होनी चाहिए। यही वजह है कि हम आरती के समय कपूर जलाते हैं, जो पूरी तरह जल जाता है और अपने पीछे कुछ भी नहीं छोड़ता। छूटती है तो सिर्फ श्वांस। रामकथा के चौथे दिन के यजमान संध्या श्यामसुंदर खंगन और कल्याण देशपांडे थे, जिन्होंने गुरु पूजा की। तत्पश्चात प्रवचन शुरू हुआ। मंगलवार को गुलाबी ड्रेस कोड में बड़ी संख्या में पहुंचे भक्तजनों ने रामकथा का श्रवण किया।