कारसेवाः जहां पहली दफा दहशत वहीं दूसरी बार था जोश, उमंग और उत्साह
2024-01-17 04:17 PM
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आचार्य चेतन दंडवते, सचिव महाराष्ट्र मंडळ रायपुर
रायपुर। सन् 1990-92 में कार सेवा और अपनी मातृभूमि से प्रेम युवाओं में सिर चढ़कर बोल रहा था। मुझे पहली बार 1990 फिर 1992 में कार सेवा के लिए अयोध्या जाने का सौभाग्य मिला। पहली बार जहां मेरी कार सेवा दहशत के साथ गुजरीं वहीं दूसरी बार कार सेवा में जोश, उमंग और उत्साह था।
श्रीराम मंदिर ट्रस्ट समिति ने 6 दिसंबर 1992 गीता जयंती के दिन कार सेवा का दिन सुनिश्चित किया। चूंकि मैं पहली बार कार सेवा करके आ चुका था। इसलिए दूसरी बार जाने को लेकर मुझमें और ज्यादा उत्साह था। पिछली बार मेरे साथ गए आठ दोस्तों में तीन दो फिर से मेरे साथ जाने को तैयार हुए। 3 दिसंबर को हम लोग कारसेवा करने के लिए सारनाथ एक्सप्रेस से रवाना हुए। उन दिनों उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार थी। कारसेवकों को रोकने के लिए इलाहाबाद से पहले नैनी स्टेशन में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात थी।
दूसरे दिन दोपहर में जैसी ही ट्रेन नैनी स्टेशन में इंटर करने वाली थी। हमने खिड़की से बाहर देखा कि बड़ी संख्या में पुलिस के जवान स्टेशन में तैनात है। हम समझ गए कि हमें यहां रोक लिया जाएगा। इस बार हमारे साथ महिलाओं की टीम भी कारसेवा करने गई थी। पुलिस ने सारी महिलाओं को वहां उतार दिया और नैनी स्कूल में बने अस्थाई जेल में रखा। वहीं हम लोग ट्रेन के रूकने से पहले ही उतर गए और भागकर स्टेशन से बाहर निकल आए। हमारे साथ दूसरे कार सेवक भी थे। हम खेतों के रास्ते पैदल चलते हुए इलाहाबाद पहुंचे। बाद में गाड़ी करके 4 की रात तक अयोध्या पहुंच गए।
इस बार अयोध्या में पिछली बार की तुलना में अधिक कार सेवक पहुंचे थे। 4 दिसंबर को हम लोगों ने सरयू नदी में स्नान किया। अयोध्या धूमे और हनुमानगढ़ी का दर्शन किया। इस बार भी हम उसी मठ में रूके थे, जहां हम 1990 के दौरान रूके थे। लेकिन इस बार लोगों में दहशत नहीं उत्साह था। 6 दिसंबर को अयोध्या में लालकृष्ण आडवाणी, साध्वी ऋंतम्बरा का कार्यक्रम था। हमने उनका भाषण सुना। उन्होंने सभी से शांतिप्रिय ढंग से कारसेवा करने की अपील की।
फिर निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सभी लाइन में लगकर मंदिर परिसर में प्रवेश करने लगे। हम सुबह 9 बजे से लाइन में लगे थे। मंदिर परिसर में प्रवेश करते करते हम लोगों को 12 बज गए। इस बीच कारसेवा करने पहुंचे एक साधु ने पुलिस की गाड़ी का अपहरण कर लिया और सायरन बजाते हुए मंदिर परिसर में प्रवेश किया। जयश्रीराम के नारे लगाते हुए वह साधु देखते ही देखते पहले गुंबद में चढ़ गया। हाथ में भगवा ध्वजा लेकर गुंबद में फहरा दिया। उनको रोकने के लिए पुलिस उनके पीछे दौड़ी और इधर भीड़ बेकाबू होकर गुंबद की ओर जाने लगी। हम भी तेजी से गुंबद की ओर भागे। हम जैसे तैसे करते गुंबद में चढ़ गए। इस बीच एक कारसेवक ने हमें नीचे से सब्बल और कुदाल दी। मैंने सब्बल पकड़ लिया। गुंबद में सबसे पहले चढ़े साधू को पुलिस ने उतार दिया और उसकी जमकर पिटाई की, लेकिन तब तक बहुत सारे लोग गुंबद में चढ़ चुके थे। देखते ही देखते गुंबद धराशायी हो गया।
इस बीच एक और वाक्या घटित हुआ। जिसका मैं जिक्र अवश्य करना चाहूंगा। साधू द्वारा गुंबद में लगाया गया भगवा ध्वज गिरने लगा तो एक बंदर वहां पहुंचा और उसने उसे गिरने से रोक दिया। जिसे देख गुंबद तोड़ने चढ़े कारसेवकों का उत्साह दोगुना हो गया। और देखते ही देखते पहला गुंबद धराशायी हो गया। चूंकि हमारी कार सेवा हो चुकी थी, और पिछली बार की गोलीबारी का मंजर हमें याद था, इसलिए हम लोग बिना देर किए मठ में लौट आए। शाम तक खबर मिली कि तीनों गुंबद गिर चुके है। हम लोग उसी दिन रात को अयोध्या से निकलकर इलाहाबाद आ गए। फिर ट्रेन बैठकर रायपुर आए। इस तरह मेरी पहली कार सेवा जितनी दहशत में थी दूसरी कारसेवा मे उतना ही उत्साह और उमंग था।