नशे की गिरफ्त में बचपन; हर सात में से एक छात्र नशे का शिकार, असली आंकड़े और भी भयावह
2025-12-10 01:37 PM
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नई दिल्ली– देश में ड्रग्स और नशे की समस्या अब भयावह रूप ले रही है। ताज़ा सर्वे से पता चला है कि बच्चे महज 11 साल की उम्र में ही नशे की चपेट में आ रहे हैं। औसतन 12.9 साल की उम्र में नशे की शुरुआत करने वाले इन छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और असली आंकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं क्योंकि कई बच्चे सच छिपाने की बात स्वीकार करते हैं।
दस शहरों में किया गया बड़ा सर्वे
दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, रांची, बेंगलुरु, चंडीगढ़, हैदराबाद, इंफाल, जम्मू और डिब्रूगढ़ के 5,920 छात्रों पर किए गए अध्ययन ने स्थिति की गंभीरता उजागर की। हर सात में से एक छात्र ने स्वीकार किया कि उसने कभी न कभी साइकोएक्टिव पदार्थ का सेवन किया है।
चौंकाने वाले आंकड़े
रिपोर्ट में सामने आया कि 15.1% छात्रों ने जीवन में कभी नशा किया, 10.3% ने पिछले साल और 7.2% ने पिछले महीने ही नशा किया। तंबाकू और शराब के बाद सबसे अधिक इस्तेमाल किए गए पदार्थों में ओपिओइड, भांग और इनहेलेंट शामिल हैं।
लड़के और लड़कियों में अलग पैटर्न
कक्षा 11-12 के छात्रों में नशे की प्रवृत्ति कक्षा 8 के छात्रों की तुलना में दोगुनी पाई गई। लड़कों में तंबाकू और भांग का इस्तेमाल ज्यादा था, जबकि लड़कियों में इनहेलेंट और फार्मास्युटिकल ओपिओइड का सेवन अधिक देखा गया।
छुपी हुई सच्चाई
सर्वे के दौरान आधे से ज्यादा छात्रों ने कहा कि वे नशे की बात छुपाएंगे। यह स्वीकारोक्ति बताती है कि असल समस्या कहीं अधिक गहरी है और आंकड़े वास्तविकता से कम हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर
नशे का असर केवल शरीर पर नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। पिछले साल ड्रग्स लेने वाले छात्रों में 31% मानसिक समस्याओं से जूझ रहे थे, जबकि नशा न करने वालों में यह दर 25% थी। इससे साफ है कि नशा बच्चों को भावनात्मक अस्थिरता और व्यवहार संबंधी समस्याओं की ओर धकेल रहा है।