दिव्य महाराष्ट्र मंडल

आक्रामक विचारों से तिलक ने कभी नहीं किया समझौता: जोगलेकर

रायपुर। लोकमान्य गंगाधर तिलक अपने स्वभाव और विचारों से बेहद आक्रामक थे अपनी बातों को रखने के लिए वह सामने के व्यक्ति के कद और प्रभाव की परवाह नहीं करते थे। यही वजह है की ब्रिटिश शासनकाल के उच्चाधिकारियों के अलावा मोहनदास करमचंद गांधी से भी वैचारिक रूप से उनसे भिन्न थे। महाराष्ट्र मंडल में लोकमान्य गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर इस आशय के विचार वरिष्ठ रंगकर्मी व समाजसेवी रामदास यशवंत जोगलेकर ने व्यक्त किए।

जोगलेकर ने तिलक के एक किस्से को साझा करते हुए बताया की अपने एक अग्रलेख में उन्होंने अपने करीबी दोस्त गोपाल गणेश आगरकर की भी तीखी आलोचना की थी, नतीजतन इन दोनों दोस्तों में गंभीर मतभेद हो गए। मृत्यु शैया पर लेटे आगरकर से मिलने जब लोकमान्य उनके पास गए, तब भी आगरकर का गुस्सा शांत नहीं हुआ था और उन्होंने तिलक को देखकर अपना मुंह फेर लिया था।

रामदास जोगलेकर ने बताया कि लोकमान्य गंगाधर तिलक का प्रसिद्ध नारा स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और यह मैं लेकर रहूंगा उस काल में बच्चे-बच्चे की जबान पर था। ब्रिटिश काल की शिक्षा प्रणाली से तिलक नाखुश थे। उन्होंने अपने मित्रों गोपाल कृष्ण गोखले, आगरकर, चिपलुणकर और नामजोशी के साथ मिलकर 1880 में पुणे में फर्ग्यूसन स्कूल शुरू किया था। इसमें निर्धन बच्चों को विशेष सुविधाएं दी जाती थी। इस स्कूल में लोकमान्य गणित पढ़ाते थे वो भी बिना ब्लैक बोर्ड के। क्योंकि उन्हें एक-एक गणित कंठस्थ था।

लोकमान्य बहुत अच्छी तरह जानते थे कि जनसाधारण के सहयोग के बिना कोई क्रांति सफल नहीं हो सकती, इसलिए उन्होंने लोगों को एकजुट करने के लिए गणेश उत्सव की शुरुआत की। इसके सुखद नतीजे आए और लोग इस उत्सव के नाम पर एकत्रित होते। अपने विचार साझा करते और भारत देश की स्वतंत्रता पर मनन करते। जन सहयोग से ही उन्होंने स्कूल शुरू करने के बाद साप्ताहिक पत्र शुरू किया अंग्रेजी में मराठा और हिंदी में केसरी। मराठा साप्ताहिक पत्र के संपादक तिलक जी स्वयं थे। तो केसरी के आगरकर। कुछ समय बाद मराठा साप्ताहिक पत्र बंद हो गया और केसरी का भार उन्होंने बतौर संपादक संभाल लिया। केसरी को लोग उसके अग्रलेखों की वजह अधिक पहचानते थे। और यही अग्रलेख अंग्रेज शासकों को खासे परेशान करते थे।

जोगलेकर ने कहा कि तिलक को अंग्रेजों के सामने अनुनय विनय करने की भाषा बिल्कुल पसंद नहीं थी और वह हमेशा कहते थे कि ऐसे शब्दों, वाक्यों और पत्रों के माध्यम से हम कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते।  जबकि यही भाषा महात्मा गांधी की प्रिय थी। 1897 में प्लेग कमिश्नर रैंड की हत्या के लिए उन्हें केसरी में अग्रलेख के माध्यम से भड़काने के आरोप पर 18 माह का कारावास दिया गया था। इस मौके पर उन्हें म्यानमार के मांडवी जेल में रखा गया था। सजा से बचने तिलक ने अंग्रेज शासकों के सामने माफी मांगने से इंकार कर दिया था। इसी तरह 1908 से लेकर 1914 तक उन्हें छह वर्ष का कारावास हुआ था। इस दौरान उन्होंने एकांत कारावास में गीता रहस्य जैसी पुस्तक लिख डाली।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकमान्य गंगाधर तिलक के विचार उस काल में ज्यादातर लोगों को बेहद पसंद आते क्योंकि वे इस बात को मानते थे कि जो जैसा है उसके साथ वैसा ही रवैया अपनाना चाहिए। यही वजह है कि उन्हें लोकमान्य की पदवी भी दी गई थी।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर तस्वीर पर सूत माला चढ़ाने एवं अबीर गुलाल का टीका लगाने के बाद कार्यक्रम में मंडल के अध्यक्ष अजय काळे ने अध्यक्षीय संबोधन दिया। इस मौके पर महाराष्ट्र नाट्य मंडळ के प्रसन्न निमोणकर ने भी अपने विचार रखें। वहीं कार्यक्रम के अंत में स्वावलंबन समिति की प्रभावी शताब्दी पांडे ने आभार व्यक्त किया।