दिव्य महाराष्ट्र मंडल
महाराष्ट्र मंडल में महिला केंद्रों के वर्षभर के कार्यक्रम तय

संत ज्ञानेश्वर स्कूल में समर कैंप 21 अप्रैल से.. डांस, जुंबा, मेडिटेशन के साथ होगा बहुत कुछ
बृहन्न महाराष्ट्र मंडल के शत स्थापना दिवस पर हुई सामूहिक सत्यनारायण की कथा

रायपुर के पुष्कर को बेल्जियम की विवि से मिली पीएचडी की उपाधि
रायपुर। राजधानी रायपुर के निवासी पुष्कर ढेंकणे को बेल्जियम की यूनिवर्सिटी केयू ल्यूवेन ने विगत 2 अप्रैल को पीएचडी की उपाधि से नवाजा। पुष्कर ने पीएचडी के लिए रिसर्च मटेरियल्स इंजीनियरिंग पर विवि के प्रोफेसर किम वैनमीनसेल के मार्गदर्शन में पूरा किया। बतादें कि पुष्कर महाराष्ट्र मंडल के आजीवन सभासद और एनआईटी रायपुर में माइनिंग विभाग के प्राध्यापक डॉ प्रकाश ढेकणे और सामाजिक कार्यकर्ता जयश्री ढेकणे के पुत्र है। पुष्कर की इस उपलब्धि पर महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले, सचिव चेतन दंडवते सहित पूरी कार्यकारिणी ने पुष्कर को ढेर सारी शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।
पुष्कर की मां जयश्री ढेकणे ने बताया कि पुष्कर की प्रारंभिक शिक्षा महर्षि विद्या मंदिर रायपुर, केंद्रीय विद्यालय एवं डीपीएस स्कूल रायपुर में ह हुई। जिसके बाद एनआईटी रायपुर में मेटलर्जी में स्नातक की डिग्री ली। पुष्कर को अपनी पीएचडी पूरा करने में करीब साढ़े चार साल का समय लगा। पीएचडी के दौरान तीन रिसर्च पेपर लिखे जो एससीआई जर्नल में प्रकाशित हुए। साइंस साइटेशन इनडेक्स (SCI) जर्नल विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधिक प्रतिष्ठित माने जाते है। पुष्कर ने बेल्जियम में 2017 से 2019 तक मैटेरियल्स इंजीनियरिंग एमई (मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग) पोस्ट-ग्रेजुएशन (एमएस) किया, उसके बाद पूरा समय पीएचडी का रिसर्च किया। पुष्कर आगे पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च कर रहा है।
इंटरनेशनल कलरिंग कॉम्पिटिशन में संत ज्ञानेश्वर स्कूल के बच्चों को मिला ब्रांज मेडल
रायपुर। कला के क्षेत्र में बच्चों की छुपी हुई प्रतिभा को सामने लाने और उसे प्रोत्साहित करने के लिए रंगोउत्सव संस्था के द्वारा इंटरनेशनल कलरिंग कंपटीशन का आयोजन विगत दिनों महाराष्ट्र मंडल द्वारा संचालित संत ज्ञानेश्वर स्कूल प्रांगण में ही किया गया।

कलरिंग कॉम्पिटिशन में विद्यालय के प्राइमरी और मीडिल के बच्चों ने विद्यालय की कला शिक्षिका सुदेवी विश्वास के निर्देशन में बड़े उत्साह के साथ भाग लिया. वह बहुत ही सुंदर अपनी कला का प्रदर्शन किया।

छात्र राघवेंद्र मिश्रा, टीना साहू, तथा तनिष्का साहू कक्षा नवमीं के विद्यार्थियों ने इस कंपटीशन में ब्रांज मेडल प्राप्त किया। प्राइमरी, प्री-प्राइमरी का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा। राघवेंद्र मिश्रा को स्मार्ट वाच और लावण्या गिरीभट्ट को गिटार प्राइज में मिला।

कक्षा दूसरी के छात्र प्रियल थावकर, कक्षा पांचवी की छात्रा संजना गुप्ता, डी अंजलि राव, दीपक राव तथा कक्षा चौथी की छात्रा लावण्या गिरीभट्ट आदि छात्रों को कंसोलेशन प्राइज जीता। प्री प्राइमरी के अभिज्ञा शुक्ला को भी उनकी सुंदर कलरिंग के कारण सम्मानित किया गया।

रंगोत्सव संस्था के द्वारा विद्यालय को भी मेडल प्रदान किया गया। जिसे कंपटीशन की इंचार्ज शिक्षिका अपर्णा आठले ने ग्रहण किया। शिक्षिका सुदेवी विश्वास को भी मेडल देकर सम्मानित किया।

विद्यालय के प्राचार्य मनीष गोवर्धन ने रंगोत्सव संस्था का आभार व्यक्त किया तथा बच्चों व कला शिक्षिका कभी सम्मान तथा सराहना की।
त्याग, समर्पण, धैर्य और धर्मपरायणता की प्रतिमूर्ति थी उर्मिलाः वैशाली जोशी
रायपुर। रामायण में उर्मिला, लक्ष्मण की पत्नी, एक धैर्यवान, त्यागपूर्ण और धर्मपरायण स्त्री के रूप में चित्रित की गई हैं, जो अपने पति के लिए हर प्रकार का त्याग करने को तैयार रहती हैं। त्याग, समर्पण, धैर्य, सहनशीलता, धर्मपरायणता और आत्मनियंत्रण के गुण के परिपूर्ण उर्मिला रामायण की विशेष पात्र रही। उक्ताशय के विचार मंडल सदस्य वैशाली जोशी ने रामायण के पात्रों की चर्चा के दौरान कहीं।
उन्होंने कहा कि उर्मिला को मिथिला के राजा जनक और रानी सुनयना की पुत्री है, उर्मिला को नागलक्ष्मी का अवतार माना जाता है। उर्मिला और लक्ष्मण के दो पुत्र थे, अंगद और चन्द्रकेतु। उर्मिला ने अपने पति लक्ष्मण के लिए अपने सांसारिक सुखों का त्याग किया, यहां तक कि 14 वर्षों तक पति-वियोग की कठिन अवधि को भी धैर्य से सहन किया। उर्मिला को एक धैर्यवान और सहनशील स्त्री के रूप में दिखाया गया है, जो कठिन परिस्थितियों में भी शांत और स्थिर रहती हैं। उर्मिला धर्म और मर्यादा का पालन करने वाली स्त्री के रूप में चित्रित की गई हैं, जो हमेशा सत्य और न्याय के रास्ते पर चलने में विश्वास रखती हैं।
वैशाली ने आगे कहा कि उर्मिला लक्ष्मण के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं और उनकी हर बात का सम्मान करती हैं। रामायण में उर्मिला को आत्म-नियंत्रित और शांत स्वभाव वाली स्त्री के रूप में दिखाया गया है, जो कभी भी क्रोधित या अधीर नहीं होती हैं।
रावण की उसकी सलाहकार और मार्गदर्शक थी मंदोदरीः धनश्री
रायपुर। महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चली चर्चा में धनश्री पेंडसे से रावण की पत्नी धर्मपरायणता रानी मंदोदरी के चरित्र का चित्रण किया। रामायण में मंदोदरी रावण की पत्नी, एक सुंदर, बुद्धिमान और धर्मपरायण महिला के रूप में चित्रित की गई है, जो अपने पति को हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की सलाह देती है, लेकिन रावण उनकी सलाह को अक्सर नजरअंदाज कर देता था।
धनश्री ने आगे कहा कि रामायण में मंदोदरी को अत्यंत सुंदर बताया गया है, जो माता सीता के बाद रामायण में दूसरी सबसे सुंदर महिला के रूप में जानी जाती हैं। वह एक बुद्धिमान और दूरदर्शी महिला थी, जो रावण को उसके गलत कार्यों के परिणामों के बारे में चेतावनी देती थी। मंदोदरी एक धर्मपरायण महिला थी, जो हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की कोशिश करती थी।
धनश्री ने आगे कहा कि मंदोदरी अपने पति के प्रति समर्पित थी और रावण के प्रति प्रेम और निष्ठा रखती थी। वह न केवल रावण की पत्नी थी, बल्कि उसकी सलाहकार और मार्गदर्शक भी थी, जो उसे सही मार्ग पर चलने की सलाह देती थी। मंदोदरी ने रावण को सीता के अपहरण को गलत बताया था और उसे धर्म के मार्ग पर चलने की सलाह भी दी थी।
विपरीत परिस्थितियों में परिवार को साथ छोडने वाले विभीषण आज भी हमारे समाज में अस्वीकार्य: ठेंगडी
मेघनाथ की पत्नी सुलोचना की पतिव्रता सीता से कम नहीः संगीता
रायपुर। रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान संगीता निमोणकर ने इंद्रजीत की पत्नी सुलोचना पर विचार वयक्त किए। उन्होंने कहा कि सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था। अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की, किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए। रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- "लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे क्योंकि मेघनाद एक नारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।
ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सैना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया किंतु उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।
मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया, उसने सोचा सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यकित की हो। ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- "प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है।
युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।
पति की भुजा-लिखित पंकितयां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- 'शोक न कर पुत्री - प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा’। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली- "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा? सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।'
किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।
जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"
सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- "देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी।
श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- "देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- "राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।
पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की ईनका वध मैंने किया है। मेरे स्वामी को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी।
यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर दुर्भाग्य से मेरे पति पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।
सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है।
व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मन करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा।
यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ।
उर्मिला के पतिव्रत धर्म ने लक्ष्मण को दिलाई मेघनाथ पर विजयः जोशी
रायपुर। रामायण में इंद्रजीत एक अद्वितीय योद्धा है जिनका वध शेषनारायण के अवतार लक्ष्मण ने किया। पहली बार जब लक्ष्मण और मेघनाथ को युद्ध हुआ तो मेघनाथ ने लक्ष्मण पर शक्तिबाण चलाया था। जिसके कारण वो मुर्छित हो गए थे। फिर संजीवनी लाइ गई और उन्हें बचा लिया गया। दूसरी बार युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाथ का वध किया। मेघनाथ के वध के उपरांत की एक कथा प्रचलित है, जिसमें यह बताया गया है कि मेघनाथ की पत्नी सुलोचना लक्ष्मण से कहती कि मेघनाथ का वध आपने किया है, यह सोचकर अहंकार में मत आना। वो तो अपराजेय योद्धा थे, उनका वध उर्मिला के पतिव्रत धर्म और नारी का सम्मान न करने वाले मेरे ससुर अर्थात रावण का साथ देने के अधर्म के कारण हुआ। उक्ताशय के विचार अरविंद जोशी ने रामायण के पात्रों की चर्चा के दौरान रामनवमीं के दिन कहे।
अरविंद जोशी ने आगे कहा कि सुलोचना का विवाह देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत से निश्चित हुआ। किन्तु जब सुलोचना को पता चला कि असुरों के सम्राट रावण के पुत्र मेघनाद ने इन्द्र और उनके पुत्र जयंत को हरा दिया है तो सुलोचना को मन ही मन मेघनाद से प्रेम हो गया और मेघनाद भी सुलोचना के सौंदर्य पर मुग्ध हो गया और दोनों ने विवाह कर लिया।
जोशी ने आगे बताया कि मेघनाद, लंका के राजा रावण का सबसे बड़ा पुत्र था। मेघनाद अपने पिता की तरह स्वर्ग विजयी था। मेघनाद के पास सारे दिव्यास्त्र थे तथा बहुत से मायावी शक्तियां भी थीं। मेघनाद को एक वरदान था कि उसकी मृत्यु किसी ऐसे ही व्यक्ति के हाथों होगी जिसने १२ वर्ष से भी ऊपर ब्रह्मचर्य का पालन किया हो. इसीलिए लक्ष्मण जी उसका वध कर पाए।
रामनवमीं पर महाराष्ट्र मंडल में ‘भरत मिलाप’ की शानदार प्रस्तुति

मराठी निबंध लेखन प्रतियोगिता... इन विषयों पर दिखाना होगा लेखन का जौहर
रायपुर। मध्य प्रदेश मराठी अकादमी और महाराष्ट्र साहित्य सभा इंदौर ज्येष्ठ साहित्यकार कै. कल्पना शुद्धवैशाख स्मृति में मराठी निबंध व पत्र लेखन स्पर्धा 2025 का आयोजन करने जा रही है। मराठी भाषा के संवर्धन के लिए सतत प्रयत्नशील मराठी अकादमी विगत 15 वर्षों से इसका आयोजन कर रही है।
महाराष्ट्र मंडल रायपुर के साहित्य समिति की प्रभारी कुमुद लाड ने बताया कि मराठी लोगों में मराठी लेखन की आदत विकसित करने के उद्देश्य से निबंध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है। इस प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए कुछ शर्तें भी शामिल की गई हैं। साथ ही प्रथम तीन पुरस्कारों के अलावा प्रतियोगिता में शामिल होने वालों के लिए सांत्वना पुरस्कार का भी प्रावधान रखा गया है। निबंध लेखन प्रतियोगिता के संबंध में और अधिक जानकारी के लिए मेरे मोबाइल नंबर 9009536654 पर संपर्क किया जा सकता है।
निबंध प्रतियोगिता को लेकर उन्होंने बताया कि आयु सीमा के हिसाब से तीन समूह बनाए गए हैं। प्रथम समूह जिसकी आयु सीमा 10 से 18 वर्ष है, उनके लिए निबंध का विषय ‘इंटरनेट युग में शालेय शिक्षण की उपयोगिता’ रखा गया है। वहीं द्वितीय समूह में 19 से 30 वर्ष के लोग शामिल हो सकते हैं, जिनके लिए निबंध का विषय ‘वैवाहिक कार्यक्रम का पारंपरिक स्वरूप योग्य या आधुनिक’ होगा। तीसरे समूह में 31 वर्ष से 55 वर्ष के प्रतिभागी शामिल हो पाएंगे, जिनके लिए निबंध का विषय ‘पारंपरिक विधान आडम्बर या संस्कार’ होगा। वहीं 55 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोग ‘जीवन की शाम को धमाकेदार बनाये’ पर लिखेंगे।
कुमुद लाड ने बताया कि किसी भी उम्र समूह के लिए निबंध में भाग लेने वालों को 500 से 1000 शब्दों में निबंध लिखना है। वहीं पत्र लेखन की न्यूनतम सीमा 200 शब्द और अधिकतम सीमा 500 शब्द निर्धारित की गई है। दोनों ही स्पर्धा में प्रथम पुरस्कार 1000, द्वितीय पुरस्कार 750, तृतीय पुरस्कार 500 और प्रोत्साहन राशि 250 रुपए प्रदान की जाएगी। उन्होंने बताया कि अभ्यर्थी को घर पर ही कागज के एक तरफ सुंदर सुपाठ्य अक्षरों में निबंध लिखकर 15 मई तक महाराष्ट्र मंडल के रायपुर कार्यालय में जमा करना होगा। यहां से प्रतिभागियों का निबंध इंदौर भेजा जाएगा।
राम के चरणों के स्पर्श से देवी अहिल्या का हुआ उद्धारः अर्चना धर्माधिकारी
रायपुर। महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौराम अर्चना धर्माधिकारी ने गौतम ऋषि की पत्नी देवी अहिल्या पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि मैं आहिल्या... ब्रह्माजी की मानसपुत्री। सब लोग कहते हैं की मैं बहुत सुंदर, गुणसम्पन्न, तथा मनमोहक हूं और मेरी सरलता के कारण सबकी चहेती भी हूं। मैं जब विवाह योग्य हुई तब बाबा (ब्रह्माजी) ने मेरा विवाह गौतम ऋषि से कराया। गौतम ऋषि बड़े तपस्वी ऋषि थे और सप्तऋषियों से एक जाने जाते हैं।
हमारा विवाह सम्पन्न हुआ। अब मैं गौतम ऋषि की पत्नी बन गई थी। हम दोनों सुखपूर्वक एक आश्रम में रहा करते थे की अचानक मेरी गृहस्थी को एक बुरी नजर गई। एक दिन इन्द्रदेव वन भ्रमण पर थे। उनकी नजर हमारे आश्रम पर गई। मैं आश्रम के बगिया में खड़ी थी। उन्होंने मुझे देखा और उनका मन मेरी ओर मोहित हो गया और वह देखते ही रह गए।
कुछ दिनों तक उन्होंने गौतम ऋषि की दिनचर्या पर नजर रखी। एक दिन ऋषि गौतम, भोर में ही नदी पर स्नानादि क्रियाएं करने चले गए। इस मौके का फायदा इन्द्र ने उठाया और वे गौतम ऋषि का वेश धारण कर हमारी कुटिया में आ गए और मुझसे ऋषि रूप में प्रेम भरी बातें करने लगे। वो मेरे समीप आ गए थे और में भी उनकी तरफ आकर्षित हो गयी और अपना तन मन उनको समर्पित कर दिया।
इधर कुछ समय पश्चात् प्रत्यक्ष ऋषि गौतम आये, वे देखकर अत्यंत क्रोधित हो गये, इन्द्र वहा से भाग निकला परंतु गौतम ऋषि ने उनको शाप दिया की "तुम नपुंसक बन जाओ।" [यही कारण था की इन्द्र भगवान की पूजा नहीं होती।] फिर उन्होंने मुड़कर मेरी तरफ देखा, मैं डर के मारे थर-थर कांपने लगी थी, मेरे साथ क्या हुआ मुझे समझ नहीं आ रही थी।
उन्होंने मुझे कुलटा, कुलक्षिणी कहा,मेरे ऊपर कई लांछन लगाए और मुझे श्राप दिया कि "तुम पत्थर (शिला) बनोगी।" थोड़ी देर बाद जब उनका क्रोध शांत हुआ, मैं उनसे माफी मांगते हुए कहा कि मैं अनजान थी, मुझे एहसास नहीं था मेरे साथ जो हुआ वह धोखा था। मैं उसको समझ नहीं पाई, मेरी कोई गलती नहीं है।
थोड़ा शांत होकर उन्होंने मुझे वरदान दिया की त्रेता युग में जब श्रीराम आएंगे वही तुम्हारा उद्धार करेंगे और बाद में ऋषि गौतम हिमालय चले गए। हजारों साल बीत गये, अब मैं एक पत्थर बन गई थी। आंधी, तूफान, धूप, बारिश का सामना कर रही थी। फिर एक दिन प्रभु श्रीराम, वाल्मीकि के साथ और वशिष्ठ ऋषि के साथ पथ पर चले, वे पत्थर पर कदम रखते ही धीरे-धीरे के स्पर्श से मैं अपने मूर्त रूप में आ गई। फिर एक क्षण में मेरी आंखों से अश्रुधारा बहने लग गई। मैं बोली हे प्रभु, आज मेरा जीवन धन्य हो गया। आज मुझे मेरा जन्म सफल हो गया, आप धन्य हो।तो ऐसी थी दिव्य स्त्री अहिल्या परम प्रतापी श्रीरामचन्द्र।
मराठी दासबोध में भी इसका वर्णन किया है।
अहिल्या शीला राघवे मुक्त केली
पदी लागता दिव्य होवून गेली
जया वर्णिता क्षिणली वेदवाणी
नुपक्षी कदा राम दसाभिमानी।
वाल्मीकि रामायण की कीर्ति के लिए स्वयं के लिखे रामायण को नष्ट किया श्रीहनुमान ने : डॉ मंजिरी बक्षी
रायपुर। बजरंगबली भगवान राम के अनन्य भक्त हैं। राम नाम का जाप, उनसे प्रेम एवं प्रभु चरणों में वास करते करते स्वयं भगवान हो गए हनुमान। हनुमानजी अपनी शक्ति और बल के लिए जाने जाते हैं एवं अपने भक्तों की रक्षा करते, उनकी इच्छाओं को पूरा करते है, अपने भक्तों को शक्ति और साहस प्रदान करते हैं एवं भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं। वह भगवान राम की सेना के महत्वपूर्ण सदस्य थे जो अपनी बुद्धिमत्ता और चतुराई के लिए जाने जाते हैं। उक्ताशय के विचार डॉ मंजिरी बक्षी ने रामायण के पात्रों की चर्चा के दौरान कहें।
मंजिरी ने आगे कहा कि सीताहरण के बाद जामवंत जी ने हनुमान को उनके शक्ति का स्मरण कराया (जो हनुमानजी भूल चुके थे ) तभी गुरु के आदेश का पालन करने हेतु, समय न गवाते हुए उन्होंने अथाह समुद्र को पार कर सीता माता के बारे में जानकारी ली।
मंजिरी ने कहा कि जब हम जिंदगी में असमंजस में होते है तब श्री हनुमान के जैसे ही गुरु के, या तो प्रभु की शरण में लीन हो जाए, क्योंकि गुरु ही वह स्रोत है जो जामवंत की तरह आपको आपकी भूली हुई क्षमता, शक्ति एवं बुद्धि से मिलवाता है, स्मरण कराता है। उन्होंने बताया कि प्रभु एवं गुरु की शरण जाने से ही हमे ब्रह्मांड की ऊर्जा का जल्दी अनुभव होता है। मंजिरी ने आगे हनुमान जी की पूंछ के करतब के किस्से बताए जो रावण की लंका दहन के वक्त एवं उसके साथ युद्ध करते हुए जानकारी में सामने आते है।
अंत में उन्होंने कहा कि चिरंजीवी भगवान श्री हनुमान अपनी कृपा और दया के लिए जाने जाते हैं एवं कलियुग में भी उनके होने एवं अपने भक्तों को मदद करने के किस्से सोशल मीडिया में सुने जा सकते है। अंत में मंजिरी ने अपने वक्तव्य में भजन " हे दुःख भंजन......." प्रस्तुत किया।
परशुराम और हनुमानजी के बाद जामवंत जी का तीनों युगों में होने का वर्णन मिलता है : अर्चना भाकरे
रायपुर। जामवंत रामायण के सबसे प्रमुख पात्रों में से एक हैं। एक कथा के अनुसार एक बार जब ब्रह्मा जी तप में लीन थे, उन्हें जम्हाई आ गयी और उससे ही प्रथम ऋक्ष (रीछ) का जन्म हुआ। उनकी जम्हाई से जन्म लेने के कारण उनका नाम जामवंत पड़ा। विष्णु पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी से मधु और कैटभ नामक दैत्यों ने जन्म लिया तो उस समय ब्रह्मा जी के पसीने से जामवंत का जन्म हुआ। अग्नि पुराण के अनुसार जामवंत का जन्म अग्नि से हुआ और उनकी माता एक गन्धर्व स्त्री थी। उनकी पत्नी का नाम जयवंती बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि श्रीराम अवतार के समय जामवंत की आयु छह मन्वन्तर से भी अधिक थी। उन्होंने मत्स्य अवतार को छोड़ कर कूर्म अवतार से लेकर श्रीकृष्ण अवतार तक सभी के दर्शन किये। अर्थात श्रीहरि के सात अवतारों के समय वे उपस्थित थे। उन्होंने प्रथम देवासुर संग्राम में भी भाग लिया था। उक्ताशय के विचार मंडल सदस्य अर्चना भाकरे ने मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान कहीं।
अर्चना ने आगे कहा कि जामवंत को अत्यंत विद्वान, बुद्धिमान, वेदपाठी और सदा अध्ययन करने वाला बताया गया है। उन्हें सभी वेद, पुराण, शास्त्र कंठस्थ थे। श्रीराम की सेना में वे सबसे वयोवृद्ध और बुद्धिमान थे और इसी कारण श्रीराम भी उनका बड़ा सम्मान करते थे और उनसे सलाह लिया करते थे। उनका आकार बहुत विशाल बताया गया है। आकार में वे कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। जब लक्ष्मण को शक्ति लगी तो उन्होंने ही हनुमान को चार दुर्लभ बूटियों के बारे में बताया था जिनमे से एक संजीवनी थी।
जब सुग्रीव ने वानर सेना को माता सीता की खोज में चारों दिशाओं में भेजा तो अंगद के नेतृत्व में जामवंत, हनुमान इत्यादि दक्षिण दिशा में गए। सुग्रीव ने विशेष रूप से जामवंत को अंगद के साथ भेजा ताकि वे अपने अनुभव से दल का सुरक्षित नेतृत्व कर सकें। जब सागर तट पर पहुंच कर सभी उस विशाल समुद्र को देख कर हताश हो जाते हैं तो जामवंत ही हनुमान को उनकी शक्तियों का भान करवाते हैं जिसके बाद हनुमान समुद्र को लांघते हैं।
लंका कांड में जामवंत के विषय में अधिक वर्णन दिया गया है। उन्होंने बड़ी चतुराई से सेना का संचालन किया और एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। उन्होंने रावण से भी युद्ध किया और उसपर पाद-प्रहार किया जिससे रावण मूर्छित हो गया। मेघनाद से भी उनके युद्ध का वर्णन है जब मेघनाद की फेंकी शक्ति को उन्होंने हवा में ही पकड़ कर उसपर ही छोड़ दिया। उसी युद्ध में जामवंत के प्रहारों से मेघनाद भी मूर्छित हो गया था।
भागवत पुराण और विष्णु पुराण में जामवंत की शक्ति के विषय में बताया गया है। उनकी शक्ति १००००००० (एक करोड़) सिंहों की शक्ति के बराबर कही गयी है। रामचरितमानस के अनुसार जब वानर दल समुद्र पार करने परामर्श कर रहा था तब सभी अपनी-अपनी क्षमता द्वारा उस समुद्र को पार करने की बात कर रहे थे। उस समय सबने जामवंत से ये प्रार्थना की कि सबसे बड़े होने के कारण वही उस समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। तब जामवंत ने सबको अपने बल के बारे में बताया।
जामवंत ने कहा कि इस समय मैं अत्यंत बूढ़ा हो गया हूँ फिर भी मैं एक बार में ९० योजन तक जा सकता हूँ। जब मैं युवा था तो मैंने समुद्र मंथन देखा था। उस समय मुझमें इतना बल था कि देवों और दैत्यों के थक जाने पर मैंने अकेले ही पूरे मंदराचल पर्वत को घुमा दिया था। उसे देख कर स्वयं मेरे पिता ब्रह्मा ने मेरी प्रशंसा की थी।
जब श्रीहरि ने वामन अवतार लिया और दैत्यराज बलि के पास आये तब मैं वहीँ था। जब उन्होंने बलि द्वारा दी गयी तीन पग भूमि को नापने के लिए अपना विराट स्वरुप लिया तब उस समय मैंने केवल सात क्षणों में भगवान वामन सहित पृथ्वी की सात परिक्रमा कर डाली। जब मैं परिक्रमा कर वापस लौटा तब तक भगवान वामन दैत्यराज बलि को पूरी तरह बांध भी नहीं पाए थे। कहीं कहीं उनके द्वारा पृथ्वी की २१ परिक्रमा करने के बारे में लिखा गया है।
ये सुनकर सबने पूछा कि आप इतने शक्तिशाली थे तो आपका बल क्षीण कैसे हो गया? इस पर जामवंत बताते हैं कि भगवान वामन के पृथ्वी को नापते समय जब मैं अत्यंत तीव्र वेग से उनकी परिक्रमा कर रहा था तो अंतिम परिक्रमा के समय मेरे पैर के अंगूठे का नाख़ून महामेरु पर्वत से छू गया जिससे उसका शिखर खंडित हो गया। इसे मेरु ने अपना अपमान माना और मुझे मेरे बल के क्षीण हो जाने का श्राप दे दिया।
जब लंका युद्ध समाप्त हुआ तो श्रीराम सबके बल की प्रशंसा कर रहे थे। उस समय जामवंत बड़े निराश होकर श्रीराम के पास आये और उनसे कहा कि प्रभु! मैंने तो सोचा था कि युगों बाद मुझे इस युद्ध में आनंद आएगा किन्तु पूरा युद्ध समाप्त हो गया और मेरे शरीर से पसीने की एक बून्द भी नहीं गिरी। लगता है मुझे वास्तविक युद्ध के लिए अभी और प्रतीक्षा करनी होगी।
उन्हें ऐसा कहते देख श्रीराम समझ गए कि जामवंत के मन में अहंकार आ गया है। तब उन्होंने जामवंत से कहा कि प्रतीक्षा करो, द्वापर में स्वयं तुम्हारी युद्धाभिलाषा पूर्ण करूँगा। जब द्वापर में श्रीकृष्ण ने अवतार लिया तो सत्राजित ने उनपर समयान्तक मणि के चोरी का आरोप लगा दिया। वास्तव में वो मणि सत्राजित का ही भाई ले गया था जिसे एक शेर ने मार दिया। फिर जामवंत ने उस सिंह को मार कर वो मणि अपनी बेटी को दे दी।
जब श्रीकृष्ण उस मणि को ढूढ़ने निकले तो वे जामवंत की गुफा में पहुंचे। वहाँ जब उन्होंने मणि देखी तो उसे लेना चाहा। इसपर श्रीकृष्ण और जामवंत में घोर युद्ध हुआ। भागवत पुराण के अनुसार वो युद्ध २८ दिनों तक लगातार चलता रहा। वही विष्णु पुराण के अनुसार ये युद्ध २१ दिनों तक चला था। अंत में जामवंत पसीने से लथपथ हो गए और थक गए।
जब वे परास्त होने लगे तब उन्होंने श्रीराम का स्मरण किया। ऐसा करते हीं श्रीकृष्ण ने ही उन्हें श्रीराम के रूप में दर्शन दिए। जामवंत समझ गए कि अपने दिए वचन के कारण स्वयं श्रीराम श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं। उनका अभिमान भंग हो गया और उन्होंने श्रीकृष्ण के स्वरुप को पहचान कर उनसे क्षमा याचना की। बाद में उन्होंने अपनी पुत्री जाम्बवंती का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया और स्वयं निर्वाण ले लिया।
ऐसा माना जाता है कि जामवंत ने ही जामथुन नगर बसाया था जो आज मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में है। यहाँ पर एक गुफा है जिसे जामवंत गुफा के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के बरेली में भी जामवंत तपोगुफा नामक एक गुफा है। माना जाता है कि जामवंत यही त्रेता से द्वापर तक प्रतीक्षा की थी। गुजरात के राणावाव में भी एक प्राचीन गुफा है जिसे जामवंत की गुफा ही माना जाता है।
छत्तीसगढ़ के लोगगीतों और लोककथाओं पर रचे बसे हैं रामः शुचिता देशमुख
रायपुर। राम प्रेम, विश्वास और समर्पण है। अपने वनवास काल में श्रीराम सबसे ज्यादा समय दण्यकारण्य यानी हमारे छत्तीसगढ़ बिताया। इस दौरान उनहोंने जो सबसे बड़ा काम किया वह था उनका समभाव। उन्होंने वनवासियों और लोकजन से आत्मीयता के साथ भेंट की और उनका वरण किया। वे वनवासियों के बीच पहुंचे तो उन्हें लगा राम को वनवास नहीं हमें एक नया राजा मिला है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति प्रचलित सभी लोकगीतों, तीज-त्योहार, व्यवहार में राम को अपने जीवन में उतारा। उक्ताशय के विचार शुचिता देशमुख ने महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान प्रभु श्रीराम के चरित्र का वर्णन करते हुए कहीं।
शुचिता ने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ के व्यवहार में राम का ना पहले है। इसलिए यहां के लोग जब एक-दूसरे मिलते है तो नमस्कार के बजाए सीता-राम या राम-राम कहते है। वहीं छत्तीसगढ़ के लोगों ने छत्तीसगढ़ी लोकगीत के माध्यम से अपने हर उत्सव, उमंग, तीज-त्यौहार, सुख-दुख, शोक, अपनी भक्ति में अपने अनुरूप समाहित किए हैं। छत्तीसगढ़ में लोककथा, लोकगाथा और लोकगीत इन सब में राम और राम कथा व्याप्त है।
शुचिता ने आगे बताया कि छत्तीगढ़ी लोकगीत में भोजली, जंवारा, सुआ गीत, बसदेव गीत, माता सेवा गीत, ददरिया, पंडवानी, नांचा-कूदा, गम्मत आदि राम की कथा को लोक रंग में रंग गया है। गांव-गांव में रामायण मंडलियां है, जो मनोरंजन के लिए गांव में अपनी प्रस्तुति देती है। रामायण के हर पात्र को अलग-अलग प्रसंगों में उनकी प्रस्तुतियां लोगों के मनोरंजन का बड़ा साधन है। आज भी छत्तीसगढ़ के गांवों में यह आसानी से देखने को मिल जाता है।
बचपन में मिला श्राप युवावस्था में साबित हुआ वरदानः परितोष
रायपुर। रामायण काल में सेतु निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले नल-नील से जुड़ी कई रोचक प्रसंग है। जिनमें से गिलहरी का सेतु निर्माण में योगदान और प्रभु श्रीराम द्वारा पत्थर समुद्र में छोड़े जाने का जिक्र है। वहीं एक अन्य प्रसंग और संतों द्वारा सुनने को यदा-कदा ही सुनने को मिलता है। जिसमें वानर कुमारों नल-नील को बचपन में मिले श्राम का उल्लेख मिलता है। उनके शरारती गुण के कारण दोनों ऋषि-मुनियों से श्राप मिला था कि जो भी वस्तु वे पानी में फेंकेंगे, वह डूबेगी नहीं, और इसी श्राप का उपयोग उन्होंने समुद्र पर रामसेतु (पुल) के निर्माण के लिए किया। उक्ताशय के विचार महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान नल-नील पर बोलते हुए परितोष डोनगांवकर ने कहीं।
परितोष ने आगे कहा कि चैत्र नवरात्र की अष्टमी के पावन अवसर पर आज मुझे यहां रामायण के पात्रों नल और नील पर अपने विचार व्यक्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उसके लिए आध्यात्मिक समिति का बहुत बहुत धन्यवाद। मेरा धार्मिक क्षेत्र में ज्ञान आप सभी के सामने नगण्य है पर मुझे गर्व है कि मैं भी आपकी तरह ही सनातन धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर ने मुझे भी अवसर दिया है।
अब तक इस आयोजन में अनेक वक्ताओं ने रामायण के विभिन्न पात्रों पर अपने विचार रखे, किंतु खेद का विषय है कि शायद ही कोई इनको अक्षरशः अमल करता हो। रामायण के पात्रों की जीवन शैली से प्रेरणा लेकर हमें भी अपनी जीवन शैली में सकारात्मक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।
आज मैं नल और नील की वीरता, कुशल नेतृत्व क्षमता एवं अभियंता के रूप में वानर सेना को लंका तक ले जाकर श्रीराम की सेना को विजय दिलाने के विषय में अपने विचार रख रहा हूँ। विश्वकर्मा जी के आदेश से सेतु निर्माण प्रारंभ हुआ। शिला समुद्र में डूब जाती थी, जामवंत ने प्रभु श्रीराम से आशीर्वाद प्राप्त कर शिलाओं पर प्रभु श्रीराम का नाम लिखकर उन्हें समुद्र में छोड़ा और शिलाएँ तैरने लगीं, जिससे कुशल अभियंता नल और नील के लिये सेतु निर्माण सरल हो गया. सेतु निर्माण के साथ दो प्रसंग और जुड़े हैं उनका उल्लेख भी प्रासंगिक है।
प्रसंग-1 एक गिलहरी भी मिट्टी के छोटे-छोटे कण अपने दांतो से पकड़ कर समुद्र में छोड़ रही थी. प्रभु श्रीराम की दृष्टि जब उस पर पड़ी तो उन्होंने स्नेहवश उसे उठा लिया और उसकी पीठ पर ममत्व के भाव से उंगली फेरने लगे. प्रभु श्रीराम की उंगलिया आज भी गिलहरी की पीठ पर अंकित हैं।तभी से मराठी की कहावत - मराठी म्हण "खारी चा वाटा" प्रचलित है. जिस प्रकार "राम काज" में गिलहरी का योगदान अमरत्व पा गया उसी प्रकार प्रत्येक सत्कार्य में छोटे से छोटा योगदान भी महत्वपूर्ण होता है.
प्रसंग- 2. सेतु निर्माण में जब शिलाएँ समुद्र में तैरने लगी तो एक शीला प्रभु श्रीराम ने स्वयं समुद्र में छोड़ी. वह शीला समुद्र में डूब गई. वानर सेना में आश्चर्य का भाव पसर गया. तब श्री हनुमान जी ने कहाँ कि "भगवन आप जिसे छोड़ देंगे वो कैसे तैर सकता है?"
प्रसंग-3 नल और नील बचपन में बड़े, नटखट थे और साधुओं के आश्रम में जाकर उनकी वस्तुओं को नदी में फेंक देते थे, जिससे परेशान होकर साधुओं ने नल और नील को श्राप दिया कि आप दोनों जो भी वस्तु पानी में डालोगे तो वो डूबेगी नहीं। यही श्राप सेतु निर्माण में वरदान साबित हुआ और लंका जाने के लिए श्रीराम की सेना का सेतु बनाने में नल और नील का प्रनुख योगदान हुआ।