रायपुर। सुख चेतना का एक स्तर है, इसे पाने के लिए मन संतुलित होना चाहिए। और अपने मन को संतुलित करने के लिए क्रिया योग बेहतर विकल्प है। योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया की ओर से आयोजित सत्संग ध्यान व क्रिया योगः एक सुखी और संतुलित जीवन की कुंजी विषय पर स्वामी अच्युतानंद गिरी ने उक्ताशय के विचार व्यक्त किए।
महाराष्ट्र मंडळ के संत ज्ञानेश्वर सभागृह में रविवार को स्वामी अच्युतानंद ने कहा कि सुख असल में क्या है, यह सभी जानते हैं, फिर भी उसकी तलाश में बाहरी दुनिया में करते रहते है। जबकि वह हमारे अंतःकरण में होता है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था, जो जैसा सुख चाहता है, मैं उसे वैसा ही सुख देता हूं। अंतिम सुख मैं उसे ही देता हूं, जो मेरे पास आना चाहता है। जो काम हम करना चाहते है, अगर वही काम हमें करने मिल जाए तो हमें सुख मिलता है। और इसे लेकर हमें कृतज्ञ रहना चाहिए। और जो कृतज्ञ नहीं रहता वह स्वार्थी होता है, और वह कभी सुखी नहीं रह सकता।

स्वामी अच्युतानंद के अनुसार सुख मन की स्थिति है, यह न धनवान के घर है, न गरीब के पास। सुख किसी वस्तु में भी निहित नहीं है। सुख सशर्त नहीं होता। सच्चा सुख हमें उस समय मिलेगा, जब हम अपनी इच्छाओं से ऊपर उठेंगे। क्योंकि इच्छाएं पूरी नहीं होती तो क्रोध आता है, क्रोध आने से विचार शक्ति खत्म हो जाती है, विचार शक्ति खत्म होने से हमें स्मृति भ्रंश होता है और हम गलत रास्ते पर चल पड़ते है और सुख से दूर होते चले जाते है। ज्ञान के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जो जैसा है, उसे उसी रूप में देखना ही ज्ञान है। विज्ञान हमें चीजों को वास्तविक और विस्तृत रूप में दिखाता है। ज्ञान को प्राप्त करने से हम भगवान के पास जाते हैं।
स्वामी अच्युतानंद ने कहा कि हमें वास्तविक आनंद तब मिलेगा जब हम अपने अंदर शांत हो जाएंगे। सुख की तलाश में शारीरिक यंत्रणा, मानसिक तनाव व आध्यात्म का असली परिचय छूट जाते है। इसके कारण रोग मानसिक असंतुलन जैसी स्थिति बनती है और इन्हें दूर करने के लिए हमें पैसे खर्च करने पड़ते है। जीवन में एक समय आता है जब हम खुद से यह सवाल पूछते है कि मैंने जीवन भर क्या किया और मैं कहां जा रहा हूं। आपके दिमाग में अब तक यह सवाल नहीं आया तो अंतिम समय में आएगा ही। इसका सामना करने के लिए अभी से तैयार रहें।
स्वामी जी ने कहा कि जब हम अंदर से आनंदित रहेंगे तो बाहरी चीजों का हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसे ही संतुलित जीवन कहा जाता है। हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य सच्चिदानंद होता है। अर्थात् सत् चित और आनंद। हम सब अंतिम आनंद पाना चाहते है जो कभी खत्म नहीं होता। यानी असीम आनंद। इसे क्रिया योग से प्राप्त किया जा सकता है। सभा गृह में बैठे श्रोताओं को योग क्रिया की विस्तृत जानकारी दी और मेडिटेशन भी करवाया।