रायपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक शांताराम जी का 94 वर्ष की आयु में रायपुर के वी.व्हाय. अस्पताल में निधन हो गया। बीते कुछ समय से अस्वस्थता के चलते अस्पताल में भर्ती थे। 5 सितंबर 2025 को शाम 5.45 को उनका देवलोकगमन हो गया है। 6 सितंबर 2025, शनिवार को सुबह 8 से 10 बजे तक संघ कार्यालय जागृति मंडल में उनके पार्थिव शरीर का नगर वासियों के लिए अंतिम दर्शन होगा। उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि सर्राफ जी का संपूर्ण जीवन समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण, अनुशासन तथा प्रेरणा का अद्वितीय उदाहरण रहा है। महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि सामाजिक कार्यों में उनके योगदान को सदैव स्मरण किया जाएगा। शांताराम जी का जीवन त्याग, अनुशासन और समाजोत्थान का ऐसा उदाहरण रहा, जिसने अनेकों लोगों को प्रेरित किया और राष्ट्र कार्य में लगाया। ईश्वर से प्रार्थना की है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
बैक की नौकरी छोड़ चुना राष्ट्र सेवा का मार्ग
शांताराम जी ने अपने जीवन की शुरुआत सामान्य परिवार से की और आगे पढ़ाई-लिखाई के बाद उन्हें भारतीय स्टेट बैंक में प्रबंधक के रूप में नौकरी लगी। शांताराम जी ने समाज और राष्ट्र के निर्माण के कार्य की इच्छा शक्ति के साथ नौकरी से त्याग पत्र दिया और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनना चुना और प्रचारक के रूप में उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
आरएसएस के कई पदों को किया निर्वहन
शांताराम जी ने संघ में क्रमशः मध्यप्रदेश में सागर जिला प्रचारक, रायपुर विभाग प्रचारक, छत्तीसगढ़ प्रांत के प्रांत प्रचारक, मध्य क्षेत्र के प्रचार प्रमुख और मध्य क्षेत्र सम्पर्क प्रमुख जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। इन भूमिकाओं में रहते हुए उन्होंने न केवल संगठन को मज़बूत किया, बल्कि समाज को ही अपना परिवार बना लिया।
“शुद्ध सात्विक प्रेम ही कार्य का आधार” के चरितार्थ शांताराम
डॉ. मोहन भागवत ने दिल्ली के विज्ञान भवन में 27 अगस्त 2025 को तीन दिवसीय व्याख्यानमाला 100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज में कहा था की, “शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है, यही संघ है।” यह कोई बोलने या कहने मात्र की बात नहीं है, वरिष्ठ प्रचारक शांताराम जी ने स्वयं को समाज का एक ऐसा अभिन्न अंग बना लिया जिसे सब एक प्रिय “बड़े भैया” मानने लगे। किसी के घर का अचार, किसी के घर का कोई पकवान, किसी मंदिर की बैठक, किसी के माता-पिता के स्वास्थ्य का हाल, किसी के पढ़ाई की पूछताछ, तो किसी को ठीक से ना पढने पर डांट ऐसा उनका प्रेम था। कार्यकर्ताओं की पीड़ा को स्वयं को पीड़ा मानना और उसके समाधान के लिए हर संभव प्रयास करना, कार्यकर्ताओं के सुख को अपना सुख मानना यह सब शांताराम जी का महान स्वभाव था। इसी वात्सल्य भाव से प्रभावित होकर छोटे-बड़े हर प्रकार के लोग उनसे सुख-दुःख बाँटने और मार्गदर्शन प्राप्त करना नहीं चुंकते थे।
मदकू द्वीप को किया पुनर्जीवित
शांताराम जी के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक श्री हरिहर क्षेत्र केदार मदकू द्वीप को पुनर्जीवित करना रहा। मदकू द्वीप को हरिहर क्षेत्र के रूप में बिलासपुर जाना जाता है यह शिवनाथ नदी पर स्थित एक प्राचीन द्वीप है, जिसे भगवान शिव और विष्णु के मिलन का स्थान बताया गया है। वर्ष 1990 में उन्होंने इस पुरातात्विक और आध्यात्मिक धरोहर को पुनः स्थापित करने का संकल्प लिया। उस समय यह क्षेत्र उपेक्षित हुआ करता था और यहाँ कन्वर्जन आदि समस्याएँ होने की बातें होती थी, लेकिन शांताराम जी ने इसे विकसित करने का ध्येय ले लिया और मदकू द्वीप पुनर्स्थापन के लिए उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय प्रदान किया।
सेवा और समाजोत्थान के विविध कार्य
मदकू द्वीप तक सीमित न रहते हुए शांताराम जी ने अनेक क्षेत्रों में समाजसेवा का कार्य किया। बैतलपुर की कुष्ठ बस्ती चंदरपुर में शिव मंदिर निर्माण कर उन्होंने वहां रहने वाले लोगों के आत्मबल को बढ़ाया। इसके साथ ही चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराकर उन्होंने गरीब और असहाय मरीजों को राहत दिलाई।
नवागढ़ के शमी गणेश मंदिर का पुनर्निर्माण भी उनकी प्रेरणा से हुआ। दरूवनकांपा और आस-पास के क्षेत्रों में सेवा और स्वास्थ्य सुविधाओं को गति देने का श्रेय भी शांताराम जी को ही जाता है। उन्होंने हमेशा समाज के अधिक से अधिक व्यक्तियों तक राष्ट्र निर्माण की भावना का निर्माण किया।
प्रेरणा का स्रोत बने शांताराम जी
शांताराम जी का व्यक्तित्व एक कुशल संगठक, मृदुभाषी, राष्ट्र प्रेमी और सेवा भावी के रूप में एक आदर्श रहा। संघ के स्वयंसेवक प्रार्थना में ईश्वर से “अजेय शक्ति, सुशील, ज्ञान, वीरव्रत और अक्षय ध्येयनिष्ठा” इन पाँचों गुण को मांगते है। तपोमय जीवन के फलस्वरूप शांताराम जी का जीवन पाँचों गुणों से व्याप्त होकर समाज और स्वयंसेवकों के लिए एक जीवंत उदाहरण बन गया। वे अपने व्यवहार, त्याग और अनुशासन से कार्यकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक बने। उनके संपर्क में आए असंख्य लोगों ने जीवन की दिशा बदली और समाजहित के कार्यों में जुटे। उनके निधन से कार्यकर्ताओं में गहरा शोक है, लेकिन उनकी स्मृतियां सदैव साथ रहेगी जिससे भविष्य की पीढ़ियों को कार्य हेतु एक बड़ी प्रेरणा मिलती रहेगी।