नारी का सम्मान करोगे तो ‘जटायु’ की भांति मोक्ष देने आएंगे मेरे रामः प्रसन्न
2025-04-04 08:47 AM
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रायपुर। सनातन संस्कृति में नारी को सम्मान सर्वोपरि है। ईश्वर ने खुद से पहले मां को स्थान दिया है। हमारे यहां सीता-राम, राधा-कृष्ण नाम से ईश्वर को पुकारा जाता है यानी नारी का नाम और स्थान पहले है। रामायण में जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए संघर्ष किया और दोनों पंखों के कट जाने के बाद वह मुर्छित अवस्था में श्रीराम की प्रतीक्षा करता रहा। नारी के सम्मान का उसे प्रतिसाद यह मिला कि श्रीराम स्वयं उसे श्रद्धांजलि देते हुए मोक्ष प्रदान किया। उक्ताशय के विचार दिव्यांग बालिका विकास गृह के प्रभारी प्रसन्न निमोणकर ने महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान गुरुवार को कहीं।
निमोणकर ने चर्चा के दौरान इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त किए पक्षी राज जटायु और भीष्म पितामह पर चर्चा की। भीष्म को हस्तिनापुर की राजसभा में कुलवधू द्रौपती का न सिर्फ अपमान होते देखा, बल्कि समक्ष होते हुए भी उसका विरोध नहीं किया। इच्छा मृत्यु के वरदान के बाद भी उन्हें 58 दिनों तक बाणों की शैय्या पर रहना पड़ा। श्रीकृष्ण स्वयं उनके पास खड़े थे, लेकिन उन्हें नारी के अपमान का दंड सहना पड़ा।
निणोणकर ने कहा कि वहीं दूसरी ओर त्रेतायुग में जब रावण माता सीता का हरण करके ले जा रहा था, तब जटायु ने उन्हें आकाश मार्ग से जाते देखा, और एक नारी की आवाज सुनकर ऊंची उड़ान भरी और रावण से युद्ध किया। रावण के प्रहार से उसके पंख कट गए। जटायु ने अपने पंजों और चोंच से रावण और उसके पुष्पक विमान को काफी क्षति पहुंचाई, लेकिन इतने संघर्ष के बाद भी माता की रक्षा नहीं कर सका। पंख कटने के बाद वह धरती पर गिरा और मरणासन्न अवस्था में पहुंच गया। जब यमराज उनके प्राण लेने आए। उन्होंने यमराज से निवेदन किया कि माता सीता की खोज में प्रभु श्रीराम यहां आएंगे, उन्हें श्रीराम से भेंट होने तक इच्छा मृत्यु का वरदान दें। प्रभु के प्रति भक्ति देख यमराज ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। श्रीराम दण्डकारण्य पहुंचे और आहत जटायु से भेंट की। जटायु सारा वृत्तांत सुना। अंत समय में जटायु श्रीराम की गोद में थे। जटायु का अंतिम संस्कार स्वयं प्रभु श्रीराम ने किया।
निमोणकर ने आगे कहा कि दोनों योद्धाओं को इच्छा मृत्यु का वरदान मिला, परिस्थितियां भिन्न थी। एक को सीधे मोक्ष की प्राप्ति हुई और दूसरे को जीवन के अंतिम क्षण में भगवान के पास होते हुए भी अपार कष्ट उठाना पड़ा। मामला सिर्फ नारी के सम्मान और अपमान से जुड़ा था। रामायण का यह पात्र हमें इस बात की सीख देते है कि नारी का सम्मान करना चाहिए। चाहे फिर वह खुद की पत्नी हो, मां, बहन, पड़ोसी, आफिस में कार्य करने वाली महिला कलिग क्यों न हो।





