शिव-पार्वती विवाह रस्म पूर्ण, पंडाल गूँजा “हर-हर महादेव”
2025-12-12 08:05 AM
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शिवपुर। शहर के विशाल लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में आज भगवान शिव और माँ पार्वती के दिव्य विवाह की समस्त रस्में वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और “हर-हर महादेव” के जयकारों के बीच विधि-विधान से संपन्न हुईं। गंधर्व विवाह का क्षण आते ही पूरा यज्ञ-मंडप आनंदाश्रुओं और भक्ति रस में डूब गया। सैकड़ों श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।यज्ञ मंडप में फलाहारी बाबा संत सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष पूज्य महंत श्री राम दास त्यागी जी महाराज, योगीराज राम करण दास त्यागी जी महाराज, कमलेश केशरी, विनोद कुमार दुबे, आनंद अग्रवाल सहित हजारों भक्त उपस्थित रहे। सभी ने कथा श्रवण कर शिव-पार्वती विवाह की रस्मों में सहभागिता की और पुण्य अर्जित किया।
कैलास ही शिव, शिव ही कैलास” – व्यासपीठ से गूँजा शिव-तत्त्व
कथा वाचक पूज्य श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी महाराज ने आज कैलास पर्वत को जीवंत शिव-स्वरूप बताते हुए कहा,
“शं करोति इति शंकरः – जो मन की समस्त शंकाओं का नाश कर दे, वही शंकर है। वर्षों की तपस्या के बाद भी जब इच्छा पूरी नहीं होती तब शंका जन्म लेती है। उस शंका का एकमात्र निवारण शिव-श्रवण और स्वाध्याय है।”
आचार्यश्री ने आगे कहा, “शिव का अर्थ है परम कल्याणकारी आनंद स्वरूप। कैलास को देखते ही जो आंतरिक आनंद की तरंग उठती है, वही शिव-तत्त्व की पहली झलक है। कैलास की चमक महाद्युति है, उसकी शक्ति महाशक्ति है। उससे निकलने वाली नदियाँ शिव की जटाओं से बहती गंगा की जीवंत स्मृति हैं। विश्व की एक-चौथाई जनसंख्या इन्हीं नदियों के जल से पोषित होती है – यही शिव का प्राण-तत्त्व है।”
कैलास की हिमराशि को भस्म का प्रतीक बताते हुए आचार्य जी बोले,
“यह भस्म हमें संसार की अनित्यता का बोध कराती है। दक्षिणी मुख पर दिखने वाला त्रिपुंड्र तीनों लोकों का प्रतीक है, जिनका संहार भी स्वयं महादेव करते हैं।”
कलियुग में शिवलिंग अभिषेक ही सबसे सरल साधना
व्यासपीठ से स्पष्ट संदेश गूँजा – “कलियुग में भगवान शंकर सबसे शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। शिवलिंग पर चढ़ाया एक लोटा जल भी समस्त पाप और कल्मष धो देता है। यही सभी धर्म-मर्मज्ञों का एकमत है।”
यज्ञ के अंत में विशाल महाआरती हुई और सभी भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया।
कल सुबह से भगवान नर-नारायण की दिव्य कथा तथा महायज्ञ की पूर्णाहुति होगी।
हर-हर महादेव ! जय माँ पार्वती ! जय श्री लक्ष्मी-नारायण !