दिव्य महाराष्ट्र मंडल
हनुमान जयंती पर मंडल के महिला केंद्रों में रामरक्षा स्तोत्र और हनुमान चालीसा पाठ
रायपुर। महराष्ट्र मंडल की आध्यात्मिक समिति की ओर से हर शनिवार होने वाला राम रक्षा स्त्रोत और हनुमान चालीसा का पाठ इस शनिवार हनुमान जयंती पर उल्लास के साथ किया गया।

जहां एक ओर महाराष्ट्र मंडल की ओर से तात्यापारा स्थित दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर में पाठ का आयोजन किया गया। वहीं दूसरी से अलग-अलग महिला केद्रों की टीम ने स्थानीय मंदिरों और सदस्यों के घरों में अपना नियमित पाठ जारी रखा।

आध्यात्मिक समिति की समन्वयक आस्था काले ने बताया कि चौबे कॉलोनी केंद्र का हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ केंद्र की सह संयोजिका स्वाति डबली के घर किया गया। इस दौरान अक्षता पंडित,स्वाति डबली, प्रियंका डबली, प्रीति शेष, चारु शीला देव, सुषमा आप्टे, अवंती अग्निहोत्री, प्रमोदिनी देशमुख, माधुरी डबली और अर्चना मुकादम उपस्थित थीं।

आस्था ने आगे बताया कि सरोना केंद्र की टीम सालासर ग्रीन्स स्थित मंदिर में रामरक्षा स्तोत्र, सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का पाठकिया। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित थीं। वहीं टाटीबंद केंद्र द्वारा किए गए पाठ के दौरान कुंद्रा अत्रे, अंजली खेर, लीना साठे, मनीषा मार्जिवे उपस्थित रही। अमलीडीह केंद्र नर्मदेश्वर महादेव के मंदिर में पाठ किया गया। पाठ के दौरान अर्चना भाखरे, अक्षरा भागड़े, रितिका चंदेल व अन्य भक्तगण उपस्थित थे।
प्राचीन तात्यापारा हनुमान मंदिर में भक्तिमय उत्साह के साथ मनाया गया हनुमान जन्मोत्सव


कलचुरी राजवंश काल हुई थी तात्यापारा स्थित हनुमान मंदिर की स्थापना
रायपुर। आज हनुमान जयंती है, हम आज आपको एक ऐसा मंदिर की जानकारी देने जा रहे हैं, जो 100-200 साल नहीं अपितु 12वीं सदी का दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर है। जी..हां... यह मंदिर राजधानी रायपुर के तात्यापारा चौक पर स्थित है। मंदिर में स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा 12वीं सदी में कलचुरी राजवंश काल में की गई थी।
मंदिर समिति के अध्यक्ष चंद्रकांत मोहदीवाले और श्री हनुमान मंदिर समिति के साथ महाराष्ट्र मंडल की कार्यकारिणी सदस्य नमिता शेष ने बताया कि मंदिर में स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा में सिंदूर का चोला चढ़ाया जाता था। अक्टूबर 2017 में मूर्ति के सामने के हिस्से से सिंदूर का चोला गिर गया, मंदिर ट्रस्ट के लोगों ने पहली बार मूर्ति से सारा चोला हटवाया। तब जाकर मूर्ति का नया स्वरूप सामने आया। सभी लोगों ने पहली बार मूर्ति का नया स्वरूप देखा था। इसके बाद पुरातत्व विभाग की टीम मंदिर पहुंची और जांच के बाद यह पता चला कि 12वीं सदी में कलचुरी राजवंश काल में मूर्ति की स्थापना की गई है।
मंदिर के उपाध्यक्ष दीपक किरवईवाले ने बताया कि मूर्ति का नया स्वरूप आने के बाद अब बजरंग बली की मूर्ति में सिंदूर का चोला नहीं चढ़ाया जाता। मूर्ति में केवल फूलों की माला ही चढ़ाई जाती है। नया स्वरूप आने के बाद मूर्ति के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए अभिषेक और चोला चढ़ाने की परंपरा बंद कर दी गई है। मंदिर में प्रत्येक शनिवार भजन कीर्तन सौ सालों से अनवरत होते आ रहा है। भजन गाने वाले भी तीन पीढ़ियों से इससे जुड़ी हुई हैं। हर मंगलवार को रात आठ बजे भक्तगण मंदिर में सुंदरकांड का पठन करेंगे।
आज मनाया जा रहा जन्मोत्सव
तात्यापारा स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर में श्री हनुमान जन्मोत्सव शनिवार, 12 अप्रैल को धूमधाम से मनाया जा रहा है। हरि कीर्तन और सुंदरकांड पाठ के साथ शाम 7 बजे महाराष्ट्र मंडल के सभासद, भक्तों के साथ रामरक्षा स्रोत और हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया जाएगा। तत्पश्चात श्री हनुमान की महाआरती की जाएगी। इस दौरान प्रत्येक भक्त के हाथ में एक- एक दीया होगा। महाआरती के बाद महाप्रसाद का वितरण किया जाएगा। तत्पश्चात भजन- कीर्तन होगा।
पर्ची निकालकर तय करेंगे कौन सा कार्यक्रम किस सदस्य के घर
तात्यापारा स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर में श्री हनुमान जन्मोत्सव 12 अप्रैल को
भरतनाट्यम महोत्सव संत ज्ञानेश्वर स्कूल की अदिति प्रथम
रायपुर। राजधानी रायपुर की संगीता कला एकाडमी द्वारा 5 अप्रैल को 'नटरंग' नृत्य महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसमें बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने भाग लिया। संत ज्ञानेश्वर विद्यालय की अदिति बाग ने भरतनाट्यम स्पर्धा ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए जूनियर कैटेगरी में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
संत ज्ञानेश्वर विद्यालय के प्राचार्य मनीष गोवर्धन ने बताया कि संगीता कला एकाडमी द्वारा आयोजित 'नटरंग' नृत्य महोत्सव में कक्षा सातवीं की छात्रा अदिति बाग ने भाग लिया। अदिति ने नृत्य महोत्सव में भरतनाट्यम विधा में अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए जूनियर कैटेगरी में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
महाराष्ट्र मंडल में अंतर संस्था और अंतर समाज स्तरीय दो दिवसीय कैरम स्पर्धा 26-27 अप्रैल को
रायपर। महाराष्ट्र मंडल की खेलकूद समिति द्वारा दो दिवसीय कैरम स्पर्धा का आयोजन 26-27 अप्रैल को किया जा रहा है। अंतर संस्था और अंतर समाज के लिए आयोजित इस स्पर्धा का शुभारंभ चौबे कालोनी स्थित महाराष्ट्र मंडल में 26 अप्रैल को सुबह 10 बजे किया जाएगा।
महाराष्ट्र मंडल की सहसचिव मालती मिश्रा ने बताया कि दो दिवसीय प्रतियोगिता के लिए प्रवेश शुल्क निर्धारित किया गया है। एकल प्रतिभागी से 350 और युगल से 700 रुपये लिया जाएगा। पुरूष वर्ग के लिए एकल और युगत वहीं महिलाओं के लिए सिर्फ एकल स्पर्धा होगी। उक्त मैच के रेफरी एवं चीफ रेफरी छत्तीसगढ कैरम एसोसिएशन के होंगे। जहां नॅशनल गेम के नियम लागू होंगे।
खेलकूद समिति के हेमंत मार्डीकर ने बताया कि महाराष्ट्र मंडळ के आजीवन सदस्य व पदाधिकारी भी इस स्पर्धा में भाग ले सकते है। ऑनलाईन प्रवेश शुल्क के लिए महाराष्ट्र मंडळ के स्कैनर में जमा किया ज सकता है। स्पर्धा मे भाग लेने के लिये न्यूनतम आयु 18 वर्ष होना आवश्यक है। जिन प्रतिभागियों को स्पर्धा में शामिल होना है वे 16 अप्रैल तक प्रवेश शुल्क जमाकर अपना नाम दर्ज करा सकते है। अधिक जानकारी के लिए मालती मिश्रा 9329822985, हेमंत मार्डीकर 9993059700, ओपी कटारिया 9131513357 और सुधीर जाऊळकर 9827111477 से संपर्क किया जा सकता है।
महाराष्ट्र मंडल में महिला केंद्रों के वर्षभर के कार्यक्रम तय

संत ज्ञानेश्वर स्कूल में समर कैंप 21 अप्रैल से.. डांस, जुंबा, मेडिटेशन के साथ होगा बहुत कुछ
बृहन्न महाराष्ट्र मंडल के शत स्थापना दिवस पर हुई सामूहिक सत्यनारायण की कथा

रायपुर के पुष्कर को बेल्जियम की विवि से मिली पीएचडी की उपाधि
रायपुर। राजधानी रायपुर के निवासी पुष्कर ढेंकणे को बेल्जियम की यूनिवर्सिटी केयू ल्यूवेन ने विगत 2 अप्रैल को पीएचडी की उपाधि से नवाजा। पुष्कर ने पीएचडी के लिए रिसर्च मटेरियल्स इंजीनियरिंग पर विवि के प्रोफेसर किम वैनमीनसेल के मार्गदर्शन में पूरा किया। बतादें कि पुष्कर महाराष्ट्र मंडल के आजीवन सभासद और एनआईटी रायपुर में माइनिंग विभाग के प्राध्यापक डॉ प्रकाश ढेकणे और सामाजिक कार्यकर्ता जयश्री ढेकणे के पुत्र है। पुष्कर की इस उपलब्धि पर महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले, सचिव चेतन दंडवते सहित पूरी कार्यकारिणी ने पुष्कर को ढेर सारी शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।
पुष्कर की मां जयश्री ढेकणे ने बताया कि पुष्कर की प्रारंभिक शिक्षा महर्षि विद्या मंदिर रायपुर, केंद्रीय विद्यालय एवं डीपीएस स्कूल रायपुर में ह हुई। जिसके बाद एनआईटी रायपुर में मेटलर्जी में स्नातक की डिग्री ली। पुष्कर को अपनी पीएचडी पूरा करने में करीब साढ़े चार साल का समय लगा। पीएचडी के दौरान तीन रिसर्च पेपर लिखे जो एससीआई जर्नल में प्रकाशित हुए। साइंस साइटेशन इनडेक्स (SCI) जर्नल विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधिक प्रतिष्ठित माने जाते है। पुष्कर ने बेल्जियम में 2017 से 2019 तक मैटेरियल्स इंजीनियरिंग एमई (मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग) पोस्ट-ग्रेजुएशन (एमएस) किया, उसके बाद पूरा समय पीएचडी का रिसर्च किया। पुष्कर आगे पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च कर रहा है।
इंटरनेशनल कलरिंग कॉम्पिटिशन में संत ज्ञानेश्वर स्कूल के बच्चों को मिला ब्रांज मेडल
रायपुर। कला के क्षेत्र में बच्चों की छुपी हुई प्रतिभा को सामने लाने और उसे प्रोत्साहित करने के लिए रंगोउत्सव संस्था के द्वारा इंटरनेशनल कलरिंग कंपटीशन का आयोजन विगत दिनों महाराष्ट्र मंडल द्वारा संचालित संत ज्ञानेश्वर स्कूल प्रांगण में ही किया गया।

कलरिंग कॉम्पिटिशन में विद्यालय के प्राइमरी और मीडिल के बच्चों ने विद्यालय की कला शिक्षिका सुदेवी विश्वास के निर्देशन में बड़े उत्साह के साथ भाग लिया. वह बहुत ही सुंदर अपनी कला का प्रदर्शन किया।

छात्र राघवेंद्र मिश्रा, टीना साहू, तथा तनिष्का साहू कक्षा नवमीं के विद्यार्थियों ने इस कंपटीशन में ब्रांज मेडल प्राप्त किया। प्राइमरी, प्री-प्राइमरी का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा। राघवेंद्र मिश्रा को स्मार्ट वाच और लावण्या गिरीभट्ट को गिटार प्राइज में मिला।

कक्षा दूसरी के छात्र प्रियल थावकर, कक्षा पांचवी की छात्रा संजना गुप्ता, डी अंजलि राव, दीपक राव तथा कक्षा चौथी की छात्रा लावण्या गिरीभट्ट आदि छात्रों को कंसोलेशन प्राइज जीता। प्री प्राइमरी के अभिज्ञा शुक्ला को भी उनकी सुंदर कलरिंग के कारण सम्मानित किया गया।

रंगोत्सव संस्था के द्वारा विद्यालय को भी मेडल प्रदान किया गया। जिसे कंपटीशन की इंचार्ज शिक्षिका अपर्णा आठले ने ग्रहण किया। शिक्षिका सुदेवी विश्वास को भी मेडल देकर सम्मानित किया।

विद्यालय के प्राचार्य मनीष गोवर्धन ने रंगोत्सव संस्था का आभार व्यक्त किया तथा बच्चों व कला शिक्षिका कभी सम्मान तथा सराहना की।
त्याग, समर्पण, धैर्य और धर्मपरायणता की प्रतिमूर्ति थी उर्मिलाः वैशाली जोशी
रायपुर। रामायण में उर्मिला, लक्ष्मण की पत्नी, एक धैर्यवान, त्यागपूर्ण और धर्मपरायण स्त्री के रूप में चित्रित की गई हैं, जो अपने पति के लिए हर प्रकार का त्याग करने को तैयार रहती हैं। त्याग, समर्पण, धैर्य, सहनशीलता, धर्मपरायणता और आत्मनियंत्रण के गुण के परिपूर्ण उर्मिला रामायण की विशेष पात्र रही। उक्ताशय के विचार मंडल सदस्य वैशाली जोशी ने रामायण के पात्रों की चर्चा के दौरान कहीं।
उन्होंने कहा कि उर्मिला को मिथिला के राजा जनक और रानी सुनयना की पुत्री है, उर्मिला को नागलक्ष्मी का अवतार माना जाता है। उर्मिला और लक्ष्मण के दो पुत्र थे, अंगद और चन्द्रकेतु। उर्मिला ने अपने पति लक्ष्मण के लिए अपने सांसारिक सुखों का त्याग किया, यहां तक कि 14 वर्षों तक पति-वियोग की कठिन अवधि को भी धैर्य से सहन किया। उर्मिला को एक धैर्यवान और सहनशील स्त्री के रूप में दिखाया गया है, जो कठिन परिस्थितियों में भी शांत और स्थिर रहती हैं। उर्मिला धर्म और मर्यादा का पालन करने वाली स्त्री के रूप में चित्रित की गई हैं, जो हमेशा सत्य और न्याय के रास्ते पर चलने में विश्वास रखती हैं।
वैशाली ने आगे कहा कि उर्मिला लक्ष्मण के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं और उनकी हर बात का सम्मान करती हैं। रामायण में उर्मिला को आत्म-नियंत्रित और शांत स्वभाव वाली स्त्री के रूप में दिखाया गया है, जो कभी भी क्रोधित या अधीर नहीं होती हैं।
रावण की उसकी सलाहकार और मार्गदर्शक थी मंदोदरीः धनश्री
रायपुर। महाराष्ट्र मंडल में आयोजित रामायण के पात्रों पर चली चर्चा में धनश्री पेंडसे से रावण की पत्नी धर्मपरायणता रानी मंदोदरी के चरित्र का चित्रण किया। रामायण में मंदोदरी रावण की पत्नी, एक सुंदर, बुद्धिमान और धर्मपरायण महिला के रूप में चित्रित की गई है, जो अपने पति को हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की सलाह देती है, लेकिन रावण उनकी सलाह को अक्सर नजरअंदाज कर देता था।
धनश्री ने आगे कहा कि रामायण में मंदोदरी को अत्यंत सुंदर बताया गया है, जो माता सीता के बाद रामायण में दूसरी सबसे सुंदर महिला के रूप में जानी जाती हैं। वह एक बुद्धिमान और दूरदर्शी महिला थी, जो रावण को उसके गलत कार्यों के परिणामों के बारे में चेतावनी देती थी। मंदोदरी एक धर्मपरायण महिला थी, जो हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की कोशिश करती थी।
धनश्री ने आगे कहा कि मंदोदरी अपने पति के प्रति समर्पित थी और रावण के प्रति प्रेम और निष्ठा रखती थी। वह न केवल रावण की पत्नी थी, बल्कि उसकी सलाहकार और मार्गदर्शक भी थी, जो उसे सही मार्ग पर चलने की सलाह देती थी। मंदोदरी ने रावण को सीता के अपहरण को गलत बताया था और उसे धर्म के मार्ग पर चलने की सलाह भी दी थी।
विपरीत परिस्थितियों में परिवार को साथ छोडने वाले विभीषण आज भी हमारे समाज में अस्वीकार्य: ठेंगडी
मेघनाथ की पत्नी सुलोचना की पतिव्रता सीता से कम नहीः संगीता
रायपुर। रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान संगीता निमोणकर ने इंद्रजीत की पत्नी सुलोचना पर विचार वयक्त किए। उन्होंने कहा कि सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था। अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की, किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए। रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- "लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे क्योंकि मेघनाद एक नारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।
ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सैना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया किंतु उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।
मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया, उसने सोचा सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यकित की हो। ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- "प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है।
युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।
पति की भुजा-लिखित पंकितयां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- 'शोक न कर पुत्री - प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा’। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली- "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा? सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।'
किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।
जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"
सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- "देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी।
श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- "देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- "राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।
पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की ईनका वध मैंने किया है। मेरे स्वामी को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी।
यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर दुर्भाग्य से मेरे पति पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।
सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है।
व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मन करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा।
यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ।
उर्मिला के पतिव्रत धर्म ने लक्ष्मण को दिलाई मेघनाथ पर विजयः जोशी
रायपुर। रामायण में इंद्रजीत एक अद्वितीय योद्धा है जिनका वध शेषनारायण के अवतार लक्ष्मण ने किया। पहली बार जब लक्ष्मण और मेघनाथ को युद्ध हुआ तो मेघनाथ ने लक्ष्मण पर शक्तिबाण चलाया था। जिसके कारण वो मुर्छित हो गए थे। फिर संजीवनी लाइ गई और उन्हें बचा लिया गया। दूसरी बार युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाथ का वध किया। मेघनाथ के वध के उपरांत की एक कथा प्रचलित है, जिसमें यह बताया गया है कि मेघनाथ की पत्नी सुलोचना लक्ष्मण से कहती कि मेघनाथ का वध आपने किया है, यह सोचकर अहंकार में मत आना। वो तो अपराजेय योद्धा थे, उनका वध उर्मिला के पतिव्रत धर्म और नारी का सम्मान न करने वाले मेरे ससुर अर्थात रावण का साथ देने के अधर्म के कारण हुआ। उक्ताशय के विचार अरविंद जोशी ने रामायण के पात्रों की चर्चा के दौरान रामनवमीं के दिन कहे।
अरविंद जोशी ने आगे कहा कि सुलोचना का विवाह देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत से निश्चित हुआ। किन्तु जब सुलोचना को पता चला कि असुरों के सम्राट रावण के पुत्र मेघनाद ने इन्द्र और उनके पुत्र जयंत को हरा दिया है तो सुलोचना को मन ही मन मेघनाद से प्रेम हो गया और मेघनाद भी सुलोचना के सौंदर्य पर मुग्ध हो गया और दोनों ने विवाह कर लिया।
जोशी ने आगे बताया कि मेघनाद, लंका के राजा रावण का सबसे बड़ा पुत्र था। मेघनाद अपने पिता की तरह स्वर्ग विजयी था। मेघनाद के पास सारे दिव्यास्त्र थे तथा बहुत से मायावी शक्तियां भी थीं। मेघनाद को एक वरदान था कि उसकी मृत्यु किसी ऐसे ही व्यक्ति के हाथों होगी जिसने १२ वर्ष से भी ऊपर ब्रह्मचर्य का पालन किया हो. इसीलिए लक्ष्मण जी उसका वध कर पाए।